छाया

Monday, October 24, 2005

अंकुर


सफर में,
क्या धूप,
कैसी छाँव...?

खेल में,
क्या जीत,
कैसी हार...?

नींद में,
क्या भूख,
कैसा गाँव...?

साधु की,
क्या जाति,
कैसा भेष...?

प्रार्थना का,
देश क्या,
क्या काल...?

-राजेश कुमार सिंह
बन्दर लैम्पंग, सुमात्रा
इन्डोनेशिया

6 Comments:

At Monday, October 24, 2005 8:22:00 AM, Blogger Kalicharan said...

samajh nahi aaya

 
At Monday, October 24, 2005 5:09:00 PM, Anonymous Anonymous said...

In kaa aapas mein link nahin hai. Jo hai woh yeh ki ek hi tarike se kahi gai hein.

Pankaj

 
At Saturday, November 19, 2005 8:11:00 PM, Blogger रेलगाड़ी said...

अरे लिंक नहीं आपस में तो क्या हुआ..बात अच्छी लिखी है!

 
At Tuesday, November 22, 2005 2:32:00 AM, Blogger राजेश कुमार सिंह said...

टिप्पणी पर टिप्पणी लिखने वाले हे "अनामधारी" जीव! आप की टिप्पणी पर, "अनाम" का यह घूँघट रूपी आवरण हमें कत्तई अच्छा नहीं लग रहा।

आपने भी सुन रक्खा होगा, "जब नाचन हो, तो घूँघट कैसा ? "

-राजेश
(सुमात्रा)

 
At Friday, January 13, 2006 12:50:00 AM, Blogger Pratik said...

राजेश जी, आजकल आप कहाँ गायब हो गये हैं। मालुम पड़ता है कि आप बड़े व्‍यस्‍त हैं। फिर भी मुझ जैसे आपकी लेखन-शैली के प्रशंसकों के लिये कुछ-न-कुछ ब्‍लॉग पर लिखते रहा करें। नयी प्रविष्टि की प्रतीक्षा में ......

 
At Saturday, September 01, 2007 2:29:00 AM, Blogger Nishikant Tiwari said...

लहर नई है अब सागर में
रोमांच नया हर एक पहर में
पहुँचाएंगे घर घर में
दुनिया के हर गली शहर में
देना है हिन्दी को नई पहचान
जो भी पढ़े यही कहे
भारत देश महान भारत देश महान ।
NishikantWorld

 

Post a Comment

<< Home